अक्तूबर 2017

समावेशी नवाचार के रूप में जयपुर फूट

टाटा सन्स के ग्रुप चीफ प्रौद्योगिकी अधिकारी, डॉ गोपीचंद कटारागड्डा, एक कहानी सुनाते हैं कि किस तरह से एक डॉक्टर व मूर्तिकार ने साथ आकर जयपुर फूट का निर्माण किया, जो कि एक प्रख्यात निम्न लागत प्रोस्थैटिक लिंब है

2015 में, टाटा सीटीओ के एक समूह ने एमआईटी टाटा सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी व डिजाइन की यात्रा की। इस सेंटर में पेश क्ए गए प्रोग्रामों में से एक जयपुर फूट (एक कृत्रिम अंग) को बेहतर बनाने के चल रहे काम पर था। स्नातक विद्यार्थी कैथरीन ओलेन्सनावेगा ने अपना काम पेश किया कि किस तरह से जयपुर फूट के उपयोगकर्ताओं की चाल बेहतर हो सकती है। सुश्री ओलेन्सनावेगा की मास्टर डिग्री की थीसेस ने मिकेनिकल, मेटाबोलिक तथा सब्जेक्टिव पैरामीटरों के बीच के ट्रेड-ऑफ पर शोक की। उनके प्रोटोटाइप फूट को मिश्रित फीडबैक मिला जिसमें स्थिरता और ग्रामीण भारत के लिए विशिष्ट जरूरतों जैसे पालथी मार कर बैठना के लिए सुधारों के सुझाव दिए गए। सुश्री ओलेन्सनावेगा इस समय इन सुधारों पर एक पीएचडी पाठ्यक्रम को पूरा कर रही हैं।

सामुदायिक प्रभाव पर केन्द्रित टाटा रिव्यू के इस संस्करण के लिए, मैं 2007 में मेरी व मेरे जीई के सहकर्मी के साथ जयपुर फूट फैक्ट्रीम की यात्रा के आधार पर जयपुर फूट की कहानी को सुनाउंगा।

जयपुर फूट की कहानी को भिन्न-भिन्न तरीकों से कहा गया है। मैं गारंटी बाबा के साथ कहानी शुरु करता हूँ, जो जयपुर फुट वर्कशॉप के बाहर बैठते हैं। मैने उनसे पूछा कि क्या मैं उनकी तस्वीर ले सकता हूँ तो उन्होने फौरन एक वुजुर्ग मॉडल की तरह का पोज दे दिया। गेरुए कपड़ों और लंबी दाढ़ी के साथ वे एक ऑर्थोपेडिक सेंटर में मिसफिट से लग रहे थे। यह उपयुक्त है कि उनका नाम गारंटी बाबा है (बाबा का अर्थ है पिता) — जो सुबह इस वर्कशॉप के दरवाजों में लंगड़ाते हुए प्रवेश करते हैं वे गांरंटी के साथ शाम को जयुपर फूट या कैलीपर्स के साथ बाहर निकलते हैं जो उनको जबरदस्त बेहतर गतिशीलता देते हैं जिनको पूरी तरह से मुफ्त दिया जाता है। यह वर्कशॉप भी अपने आप में मजेदार है — यहां पर मोची, मूर्तिकार, बढ़ई, धातु कामगार, डॉक्टर व इंजीनियर उपस्थित रहते हैं। ढ़ेर सारे विदेशी विद्यार्थी भी इस खुली आँखों दिखने वाले आश्चर्यजनक स्थान में यहां-वहां टहलते मिल जाएंगे जिसने अक्षमता से पीड़ित 1.3 मिलियन लोगों के जीवन को सुधारने में सहायता की है।

यह जयपुर फूट एक डॉक्टर, एक मूर्तिकार और एक आश्चर्यजनक मांग वाले भारतीय उपभोक्ता की कहानी है। 1958 में ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन के एक फेलो डॉ प्रमोद करन सेठी जयपुर में सवाई मान सिंह अस्पताल में एक काम निबटा रहे थे जिसमें वे स्थानीय फार्म कर्मियों को कृत्रिम पैर प्रदान कर रहे थे। उनको आश्चर्य हुआ कि उनके रोगी उनके कृत्रिम पैरों को घरों पर टांग कर अपरने काम पर जाने के लिए बैसाखी का उपयोग कर रहे थे। अधि पूछताछ करने पर पता चला कि पश्चिमी शैली के इन कृत्रिम पैरों के साथ वे पालथी मार कर नहीं बैठ सकते थे और यह एक ऐसी आदत थी जिसे व छोड़ नहीं सकते थे। वे घरों या मंदिरों में घुसने से पहले इन फुटवियर को निकालना चाहते थे तथा इस पश्चिमी कृत्रिम फूट की बूट जैसी स्थायी डिजाइन के साथ सहज नहीं हो पा रहे थे। एक और आश्चर्यजनक कारण यह था कि ग्रामीण भारत में उनको एक ऐसा पैर चाहिए था जो ऐस्थेटिक रूप से खुशनुमा और बायोनिक कॉन्ट्रैप्शन के विपरीत सजीव जैसा लगे। यहां पर मास्टर जी आते हैं जो कि मूर्तिकार राम चंद्र शर्मा का लोकप्रिय नाम है।

डॉ सेठी व मास्टरजी ने साथ मिल कर कृत्रिम फूट पर काम करना शुरु किया जो स्थानीय लोगों की मांग को बेहतर ढ़ंग से पूरा करता। विभिन्न संभावनाओं के साथ डॉ सेठी के पैरों की एनाटॉमी, प्रेशर बिंदुओं और मोटर जोड़ों के अपने ज्ञान के साथ और मास्टरजी की आम मूर्ति के निर्माण से आगे जाते हुए व पैरों की भीतरी बनावट पर काम करते हुए काफी कुछ आगे-पीछे किया गया।

समाधान तब मिला जब मास्टरजी अपना साइकिल टायर बनवा रहे थे और उन्होने मेकेनिक को वल्कनाइज़्ड रबर के उपयोग से ट्रक के टायर को ठीक करते देखा। इसने लकड़ी और वल्कनाइज़्ड रबर के संयोजन से एक कृत्रिम अंग के निर्माण के विचार को जन्म दिया। पैर जैसा दिखने के लिए, आकार देने के लिए हिन्ज्ड वूड्न ऐंकल और रबर के साथ जयपुर फूट के अंतिम प्रोटोटाइप को काम करने लायक बनने से पहले काफी सारा काम करना पड़ा। यह पैर 1968 में जनता के लिये तैयार था। 1968 से 1975 तक मास्टरजी अपने सारे उत्साह के साथ नए विकसित बेहद सस्ते पैर ($30) को 60 लोगों को प्रदान किया।

फिर आए डीआर मेहता, जिन्होने एक धर्माथ संगठन भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति (बीएमवीएसएस) का गठन किया। 1969 में श्री मेहता की एक दुर्घटना हो गयी जिसमें उनकी फीमर टूट गयी। हालांकि उनके पैर के पूरी तरह से काम करने की काफी कम संभावना थी, लेकिन सर्जनों के लिए आश्चर्य के साथ वे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए। 1975 में इस दुर्घटना के बाद घटी घटनाओं के अंतिम परिणाम के रूप में जैन परंपरा के महान संत भगवान महावीर की 2,500वीं जयंती पर श्री मेहता ने बीएमवीएसएस का गठन किया। अपनी स्थापना के पहले वर्ष में बीएमवीएसएस ने जयपुर फूट को एक धर्मादा गतिविधि के रूप में किया। आज हर साल 60,000 अंग लगाए जाते हैं। यह विशाल धारा मेहता परिवार उनके धर्मादा योगदान के प्रवाह को पैदा करने की क्षमता से इंजीनियर हुआ था।

श्री मेहता और बीएमवीएसएस ने मूल्य प्रणाली व प्रबंधन अभ्यासों को व्यवहार में लागू किया इसके अलावा जयपुर फूट के पीछे की प्रौद्योगिकी को सतत रुप से बेहतर करना जारी रखा। मूल्यों का एक उदाहरण ये रहा। हालांकि यहां पर आने वाले अधिकांश रोगी समाज के निचले तबके से आते हैं और स्वयं ही डॉक्टर के स्तर पर बैठने से हिचकते हैं (वे डॉक्टर के सामने जमीन पर बैठना या खड़े रहना पसंद करते हैं), बीएमवीएसएस सांस्कृतिक समानता पर जोर देता है।

बीएमवीएसएस में सबसे वड़ा नवाचार टर्नअराउंड समय है। एक आम अस्पताल में, एडमिशन की प्रक्रिया में आधा दिन लगता है और डॉक्टर के इंतजार में शेष आधा दिन। जब एक कृत्रिम अंग की जरूरत होती है तो रोगी को मापजोख के लिए अक्सर कई बार आना होता है और अंग को कुछ महीनों के बाद फिट किया जाता है।

जयपुर फूट वर्कशॉप में अधिकांश रोगियों के साथ ऐसा संभव होता है कि वे एक ही दिन में पंजीकरण करा के उसी दिन कृत्रिम अंग लगवा के जा सकते हैं। यह वर्कशॉप में एक पतली विनिर्माण प्रक्रिया को अपनाने के कारण संभव हुआ है। बीएमवीएसएस की लीडरशिप ने देखा कि निम्न आर्थिक स्थिति वाले रोगियों के लिए यात्रा के खर्च व काम से दूर रहने के कारण बार-बार आना समस्याप्रद होता है।

आज, जयपुर फूट ने हाथ-दिमाग-बाजार बाधा को तोड़ दिया है और इसे 20 से अधिक देशों में लागू किया गया है; इसने 1.3 मिलियन लोगों के पुनर्वास में सहायता की है। यह प्रभाव मास्टरजी के हाथ, डॉ सेठी के दिमाग और श्री मेहता की उपभोक्ता समझ के मेल से संभव हुआ है।

निष्कर्षण व अपडेट स्त्रोत: कटारागड्डा, गोपीचंद; स्मैशिंग द हैंड-माइंड-मार्केट बैरियर; वाइली इंडिया, 2008, आईएसबीएन 9788126519064

डॉ गोपीचंद कटारागड्डा, ग्रुप चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर, टाटा संस टाटा समूह के स्तर पर प्रौद्योगिकी के लिए जिम्मेदार हैं, जो कंपनियों के बीच सहयोग का उपयोग करते हुए खाली स्थानों के लिए प्रद्योगिकीय रणनीतियों का निर्माण करते हुए आर&डी ऑपरेशंस का प्रबंधन करते हैं, और टाटा कंपनियों में नवाचार के लिए एक प्रचारक की तरह काम करते हैं।