अगस्त 2017

'हम अब जमीन पर और गहन तरीके से शामिल हैं'

रतन टाटा के लिए स्थिर बैठना संभव नहीं है और वे ऐसा ही पसंद करते हैं। टाटा सन्स के ये सेवामुक्त चेयरमैन अपने सामने उपस्थित जिम्मेदारियों के कारण पहले से कहीं अधिक व्यस्त हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख टाटा ट्रस्ट्स को संभालना है, जिस संस्थान के वे मुखिया हैं और इसके परोपकारी प्रयासों को पहले से अधिक अर्थपूर्ण व चपल बनाना है।

टाटा ट्रस्ट्स ने पिछले कुछ बरसों में अपने परोपकारी हस्तक्षेपों के प्रभाव को बढ़ाने व संवर्धित करने के लिए तरीकों को बदला है। जिसका अर्थ है बड़े कार्यों पर फोकस करना, जमीन पर अधिक प्रभाव सुरक्षित करना और अंततः लक्षित समुदायों को प्रवाङित होने वाले लाभों को बेहतर करना। श्री टाटा ने यहां पर टाटा ट्रस्ट्स द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ती के लिए अपनाए जा रहे मार्ग के बारे में क्रिस्टाबेला नोरोन्हा से बात की। संपादित अंश:

टाटा ट्रस्ट्स की परोपकार की संकल्पना की नीति में पिछले कुछ बरसों में काफी बदलाव आया है। इस बदलाव ने समग्र संगठन को और जमीन पर इसके परिणामों को किस तरह का लाभ दिया है?

टाटा ट्रस्ट्स में अनेक चीजों में बदलाव आया है। एक तो यह कि परोपकार के लिए ट्रस्ट के पास उपलब्ध फंड बड़ी मात्रा में बढ़ गए हैं। अगर स्तर के मामले में हम उस तरह से काम करना जारी रखते जैसा पहले कर रहे थे तो हमारे सभी फंड को सही व अर्थपूर्ण तरीके से निपटाना कठिन हो जाता।

हमने महसूस किया कि टाटा ट्रस्ट्स को उस लीग में होना चाहिए जहां पर हम ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों को करें जो समाज व भारत के लिए समग्र रूप से अच्छे हों। इसलिए हमने पोषण, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, ग्रामीण सुधार, शहरी गरीबी, ऊर्जा व आजीविका जैसे क्षेत्रों को देखा जहां पर हम टिकाऊ रूप से योगदान कर सकते हैं।

हमारे लाभार्थियों को प्रोफाइल नहीं बदला है, लेकिन अब हम अपने संसाधनों, अपने कौशलों के सदुपयोग और मुद्दों को संबोधित करने के हमारे विजन और उन जरूरतों को देख रहे हैं जिनको हम अधिकांशतः नजरअंदाज करते थे या ऐसे क्षेत्रों को देख रहे हैं जहां पर सरकारी पहलों को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसा नहीं है कि कुपोषण की समस्या फंड की कमी के कारण जीती नहीं जा सकी है। सरकार पोषण पर काफी सारा पैसा खर्च कर रही है, लेकिन इस पैसे में से अधिकांश जरूरी लोगों तक नहीं पहुंच पाता है या निष्पादन के मार्ग में बरबाद हो जाता है। आप जितना अधिक शामिल होते हैं, इन पैसों के उपयोग के प्रभावी तरीकों व विकल्पों के संबंध में आपकी समझ उतनी बेहतर होती जाती है।

टाटा के ट्रस्टों को लोगों की निजी कठिनाइयों को दूर करने व परेशानियों के समय समुदायों की सहायता के प्रयास के लिए बनाया गया था। हमारे परोपकार के उद्देश्य मुख्य रूप से अपरिवर्तित रहे हैं लेकिन अब हम इस मामले में जमीन पर और अधिक लिप्त है कि हमारे द्वारा समर्थित प्रोजेक्ट्स किस तरह से लागू हो रहे हैं। हम विवेकपूर्ण तरीके से उद्यमों को समर्थन देते रहे हैं जिनसे लोगों व समुदायों को टिकाऊ लाभ मिलते हैं। हमारा इरादा, अपने अनुदानों के माध्यम से लोगों में दीर्घ-कालीन निर्भरता पैदा करने के स्थान पर, टिकाऊ समाधान प्रदान करने और समुदायों को आत्म-निर्भर बनाने का है।

उदाहरण के लिए पोषण में हमने शिशुओं में कुपोषण से लड़ने का प्रयास शुरु किया है। जिसके चलते स्वाभाविक रूप से हम मातृत्व स्वास्थ्य तक पहुंचे और इस तरह से यह माँ व बच्चे के लिए बन गया। स्वास्थ्य सेवा से लेकर पीने के सुरक्षित पानी, स्वच्छता, शिक्षा तथा आगे तक, सभी कुछ एक समग्र पहल में लिपटे हुए हैं। हमारे साथ साझीदारी करने वाली एनजीओ या अलाभकारी संस्थाएं समुदायों तक इन पैकेजों को पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

टाटा ट्रस्ट्स, जब अपने द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं के कार्यान्वयन में अधिक हस्तक्षेपी और सीधे तौर पर शामिल होने लगा तो इसे भिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। क्या यह दृष्टिकोण मुश्किल या कठिन था?

जैसे-जैसे टाटा संस से इन ट्रस्टों को मिलने वाले संसाधन बढ़े तो बड़े प्रोजेक्ट्स को संभालने में सक्षम अच्छी तरह से चलित एनजीओं को खोजना और कठिन होता गया। इसी समय हमने बड़े कार्यों में शामिल होने और खुद से परियोजनाओं को लेना शुरु किया, जिसमें खुद शामिल होने की जगह पर उनका प्रबंधन करना था और पहले की तुलना में अधिक भागीदारी करनी थी।

मुझे नहीं पता कि इससे किसी तरह का हस्तक्षेपी दृष्टिकोण बनता है या नहीं। पहले परियोजनाओं व पहलों को विषयों के आधार पर वर्गीकृत करने का दृष्टिकोण था। कुछ ऐसी विषयगत योजनाएं हैं जो जारी है लेकिन प्रमुख पहलें विशिष्ट क्षेत्रों के अंतर्गत निर्धारित हैं। इन पहलों में से कई सारी एनजीओ के माध्यम से जारी रहेंगी, जब तक वे मिलते रहेंगे या फिर हम उनको भिन्न तरीके से मैनेज करेंगे, अक्सर ऐसी राज्य सरकारों या आधिकारिक एजेंसियों के साथ साझीदारी में जो हमें अपने साथ काम करने का स्वागत करेंगी।

राज्य सरकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा है?

राज्य सरकारों का शामिल होना व सपोर्ट करना महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके पास प्रशासन है, पहुंच है और संसाधन हैं और कई मामलों में ऐसे चतुर व्यक्ति जो यह देख कर खुश होते हैं कि आने वाला पैसा वहां खर्च हो रहा है जहां उसे होना चाहिए।

राज्यों के वे मुख्यमंत्री जिन के साथ हम काम कर रहे हैं वे प्रोग्रामों की सफलता को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं, जिससे कि यह दोनो के लिए जीत वाली स्थिति रहती है। आरंभ में चुनौती यह थी कि राज्य सरकारों ने दूसरों के साथ इस तरह से काम नहीं किया था और ना ही हमने किया था। वह चुनौती अब हमारे पीछे हैं।

टाटा ट्रस्ट्स के इस नए तरीके में प्रौद्योगिकी तथा नवाचार एक नियमित विषय बन गया है। ऐसा क्यों है और क्या आप हमें परोपकार की विकसित हो रही योजना में उनके प्रभावों के उदाहरण दे सकते हैं।

हमारे चारो ओर की दुनिया अपनी अनेक जरूरतों के लिए प्रौद्योगिकी की ओर जा रही है। इस वास्तविकता पर ध्यान ना देना टाटा ट्रस्ट्स के लिए बेवकूफी वाली बात होगा, आप 50 बरस पहले जिस तरह से काम कर रहे थे उसी तरह करते जाना सहीं नहीं होगा। इसे समझने के लिए, 50 बरस पहले किया गया ‘पीने का पानी बचाने’ से संबंधित अभियान एक विशेष तरीके से किया जाता, जो पानी के स्रोत को साफ रखने या ऐसी किसी बात पर होता। आज की स्थिति में सुरक्षित पीने का पानी फिलटर करने से संबंधित है, जिसमें प्रौद्योगिकी शामिल है। इसी तरह से पोषण में काफी सारे प्रौद्योगिकीय इनपुट शामिल हैं। सामाजिक समस्याओं के समाधान में प्रौद्योगिकी एक जबरदस्त साधन है।

साझा सामाजिक विकास उद्देश्यों के लिए टाटा ट्रस्ट्स और टाटा कंपनियों के बीच बेहतर सहयोग एक मायावी सा लक्ष्य रहा है, हालांकि आपने कहा था कि इसके परिणाम स्वरूप “उन चीजों के बेहतर प्रभाव हासिल होंगे जिनको हम मिलकर करना चाह रहे हैं”। क्या आप आने वाले बरसों में इस पहलू पर किसी एकीकृत प्रयास को सामने आता हुआ देख रहे हैं?

कुछ टाटा कंपनियां ऐसी हैं और विशेष रूप से टाटा स्टील दिमाग में आती है, जिनके पास विशाल सामाजिक विकास प्रोग्राम हैं। ये मुख्य रूप से व्यक्तिगत कंपनियों के प्रोग्राम हैं। जिन बरसों में मैं टाटा समूह का चेयरमैन था, मैने इस संबंध में अपनी कंपनियों को साथ लाकर अधिक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया था। पिछले चार बरसों में मैने उस दृष्टिकोण को बिखरते और कंपनियों को वैयक्तिक रूप से काम करते देखा है। परिणामस्वरूप पहलों के एक शक्तिशाली समूह के स्थान पर हम विभिन्न कंपनियों द्वारा चलित असमान परियोजनाओं पर जा कर रुकते हैं।

मुझे लगता है’ कि यह नए नेतृत्व पर है कि वे ये निर्णय लें कि समूह के लिए सबसे अच्छा मॉडल क्या है। मेरी वरीयता, निश्चित रूप से एक एकीकृत मॉडल की होगी जो हमें काफी ताकत, स्केल, एकता और कई क्षमताएं दे। इसके साथ ही, कभी-कभार संबंधित कंपनी’ अपनी पहल को दूसरों के साथ साझा नहीं करना चाहती है; शामिल लोगों को यह लग सकता है कि’ यह सामान्य रूप से किए जाने वाले तरीके से विपथन होगा और वे अकेले रहना पसंद करते करें। लेकिन जब भी कोई टाटा कंपनी, ट्रस्ट्स के साथ काम करना चाहती है तो हम उस कनेक्शन का स्वागत करते हैं।

यह अनेक एनजीओ के लिए परीक्षम काल है, विशेष रूप से उनके लिए जो विपरीत स्थतियां अपना रहे हैं। इस क्षेत्र को देखने को लेकर और भारतीय परिवेश में इस पर व्यवहार पर आपकी क्या राय है?

सच्चाई यह है कि कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत 2% के अनिवार्य खर्च के साथ, सामाजिक उत्थान प्रोग्रामों में काफी सारी धनराशि आती है। एनजीओ समुदाय धन के ऐसे प्रवाह की व्यवस्था के लिए सुसज्ज नहीं है। इस तथ्य से एनजीओ द्वारा जिन चुनौतियों का सामना किया जा रहा है वे पैदा होती है। इन चुनौतियों का सामना किस तरह से किया जाता है वह निर्धारित करेगा के आने वाले समय में एनजीए समुदाय कैसा होगा।

पहले ऐसा हुआ है - और मैं ऐसा उपेक्षा के नजरिए से नहीं कह रहा हूँ - कि अनेक एनजीओ सामाजिक कार्य करते दिखना चाहते थे। यह सतही सा है! अपने दिल के नजदीक की किसी चीज को छूने, लोगों के समूह द्वारा वह करना जिसमें वे विश्वास करते हैं इसका का एहसास बिल्कुल जुदा होता है। इधर-उधर भागने वाले एनजीओ पर दबाव होगा और अधिक छानबीन होगी, जिसका अर्थ होगा कि उनके लिए फंड जुटाना कठिन होगा। पैसे जुटाने का पूरा तरीका बल रहा है; अब दानदाता पहले से कहीं अधिक इस बात की मांग करते हैं कि प्रोजेक्ट्स का वास्तविक कार्यान्वयन पूर्ण-स्पष्ट लक्ष्यों के अनुरूप हो।

जब समान संगठनों, सहायता एजेंसियों और सरकारी इकाइयों के साथ साझा सामाजिक उत्थान उद्देश्यों को हासिल करने के लिए साझीदारी बनाने की बात आती है तो टाटा ट्रस्ट्स क्या देखते हैं?

टाटा ट्रस्ट्स अब एजेंसियों की खोज नहीं करते हैं; हमें कार्यों की तलाश रहती है। हमारे द्वारा की गयी साझीदारियां लगभग हर बार उन्ही संगठनों के साथ होती हैं जो हमारे साथ हाथ मिलाना चाहते हैं। हमने बिल व मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, विश्व बैंक तथा ऐसे ही प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ सहयोग किया है। और कुछ क्षेत्र ऐसे रहे हैं जहां पर हमारे पास एस एनजीओ या एक एजेंसी है जो किसी क्षेत्र में अच्छा काम कर रही है जिसमें हम शामिल होना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे दो एनजीओ है - कर्नाटक व आंध्र प्रदेश में क्रमशः अक्षय पात्र व मन्ना ट्रस्ट - जो स्कूली बच्चों को मिडडे मील देते हैं। वे हर रोज 3,00,000 बच्चों को भोजन देने का ये जबरदस्त काम कर रहे हैं। ऐसे ऑपरेशन को स्छापित करना हमारे लिए मतलब का नहीं है, इसलिए हमने इस एनजीओ को यह प्रोग्राम विस्तृत करने के लिए फंड दिया है।

सामाजिक विकास में किन उभरते क्षेत्रों में टाटा ट्रस्ट्स ध्यान लगा रहे हैं और क्यों?

सबसे पहले तो पोषण है, दो हमें स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता और सैनीटेशन तथा सिक्षा तक ले जाता है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र किसी ना किसी रूप में भारत में पोषण जरूरतों में योगदान मे सहायता करता है। हम ऊर्जा, विशेष रूप से निम्न लागत नवीकरणीय ऊर्जा समाधानों में भी शामिल हैं। अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए हमने दरअसल कुछ क्षेत्रों का निर्माण किया है। एनजीओ के साथ हम उनके द्वारा किए जा रहे काम के परिचालन के स्तर को बढ़ाने की सोच रहे हैं। यह मिडडे मील प्रोजेक्ट को लीजिए, जैसा कि मैने पहले कहा, फिर वंचित समुदाय के युवाओं के लिए एक फुटबॉल प्रशिक्षण प्रोजेक्ट है जिसे हमने हाल ही में शुरु किया है। ये प्रोजेक्ट्स दिखाते हैं कि हम किस तरह से किसी चीज के होने में प्रेरक बनने, पुल बनने या मौजूदा अंतर को भरने का प्रयास कर रहे हैं।

पशु देखभाल केन्द्र टाटा ट्रस्ट्स की एक विशिष्ट पहल है। इसमे विशेष क्या है?

मेरा मानना है कि पशु देखभाल या पालतुओं की देखभाल की उपलब्धता, गुणवत्ता तथा क्षमता दूसरे देशों की तुलना में भारत में काफी निम्न है। आम तौर पर निजी प्रैक्टिस करने वाले ही एकमात्र विकल्प हैं और उनमें से अधिकांश के पास सर्जरी जैसी सुविधाएं नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में पशुओं की देखभाल के लिए एक नहीं बल्कि अनेक गुणवत्तापरक केन्द्रों की तत्काल जरूरत है।

हम जो कुछ करने का प्रयास कर रहे हैं उसमें विशेष जैसा कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि हम एक ऐसी सुविधा स्थापित करने की आशा कर रहे हैं जो विश्व स्तरीय हो। मुझे आशा है कि देश में हम ऐसे 10 या 20 सेंटर बना लेंगे। महत्वपूर्ण रूप से हमें अपने दैनिक जीवन में पशुओं के साथ व्यवहार के तरीके को बदलना होगा। हम इन पशुओं के साथ नियमित रूप से दुर्व्यवहार करते, मार डालते हैं और ऐसा सही नहीं है। वे भी सजीव प्राणी हैं और उनको संरक्षण दिया जाना चाहिए।

जेएन टाटा एनडाउमेंट 125 बरस पुराना है और दूसरे अन्य टाटा ट्रस्ट्स भी काफी लंबे समय से मौजूद हैं। इस कालावधि में, आपके अनुसार इन ट्रस्टों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियां क्या हैं?

मेरे लिए सबसे विश्वसनीय बात यह रही है कि ये ट्रस्ट किसी दान संगठन के रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते नहीं देखे गए हैं। हमारे ट्रस्टीज ने कभी जमीने नहीं हथियाई ना ही किसी तरह से जेबें भरी जैसा कि परोपकारी क्षेत्र में समय-समय पर होता रहता है। इसके स्थान पर हमने जो कुछ भी किया उसमें मूल्यवर्धन किया है। ऐसे अवसर रहे हैं जहां पर हमें वापस लौटना पड़ा है क्योंकि हमें सफलता नहीं मिली, लेकिन अधिकांशतः हमने अंतर पैदा किया है।

मैने टाटा ट्रस्ट्स के लक्ष्यों को संस्थागत करने का प्रयास किया है। अगर हमे विश्वास हो कि किसी क्षेत्र में बेहतरी के लिए हम बदलाव ला सकते हैं तो हम सारे उपायों के साथ योगदान करेंगे। यदि किसी कारण से हम नहीं कर सकते हैं तो हम उस क्षेत्र में दाखिल नहीं होंगे। उदाहरण के लिए, बीते दिनों में हमारे कुछ ट्रस्टों ने गरीब पारसी परिवारों के लिए निम्न-लागत घर प्रदान किए। यह योजना नियमित रूप से दुरुपयोग का कारण बनी और अक्सर सही मायनों में जरूरतमंद वंचित रह गए। इसीलिए आप हमारे ट्रस्टों द्वारा निम्न-लागत हाउसिंग की वड़ी कालोनियों को नहीं देखेंगे।

हमें गर्व है कि हम अपने उन सिद्धांतों और उद्देश्यों के प्रति ईमानदार रहे जिनके लिए अनेक टाटा ट्रस्ट स्थापित किए गए थे। हमारे परोपकारी प्रयासों की शुरुआत को एक शताबेदी से अधिक समय बीत चुका है और हमने अंतर पैदा किया है। और हम और अधिक अंतर पैदा करने की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि अब हम पहले से कहीं अधिक दृष्यमान हैं।